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वास्तुशास्त्र में विभिन्न रंगों का संक्षिप्त विवरण

पोस्टेड ओन: 2 Sep, 2012 जनरल डब्बा में

गोपाल राजू की चर्चित पुस्तक,

‘स्वयं चुनिए अपना भाग्यशाली रत्न’

का सार-संक्षेप

वास्तुशास्त्र में विभिन्न रंगों का संक्षिप्त विवरण


colorsok

अपने दुर्भाग्य को दूर करने के लिए शकुन अंधविश्वास आदि जैसी बातों से अलग अनेक गुह्य विधाओं का सहारा लेना मनुष्य की प्रवृत्ति है। इसके लिए उत्तर भारत के प्राचीन ग्रंथों  सम्रागंण सूत्रधार, विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र तथा दक्षिण भारत के ग्रंथ मानसार आदि के अनुसार एक विद्या ‘वास्तु ज्योतिष’ का प्रादुर्भाव हुआ। ज्योतिष के नियमों से अलग इनमें भवन निर्माण के लिए भूमि, मिट्टी परिक्षण, मुख्य द्वार की स्थापना आदि के लिए वास्तु ज्योतिष नियमों का पालन करने पर बल दिया गया। इनके साथ-साथ संम्पूर्ण भवन निर्माण में कुछेक अंक शास्त्रीय गणनाएं भी करवायी जाती रहीं जो आयघि सूत्र (Ayadi Formulas) कहलाती हैं। दो-ढाई दशकों से ज्योतिषीय विवेचन तथा नियम विशेष रुप से प्रतिपादित हुए जो कि मुख्यतः चार हैं।
1-   वास्तु पुरुष (Vastu Purusha)
2. दिक्पाल (Dikpalakas)
3. ग्रह व्यवस्था (Planetary System)
4. अंक शास्त्र (Numerology)

प्रस्तुत लेख में ग्रह व्यवस्था के अन्तर्गत केवल रंगों का संक्षिप्त विवरण ही दिया जा रहा है। प्रत्येक ग्रह का एक अपना रंग विशेष है जो विशेष है जो विशेष दिशा तथा जीव के प्रत्येक अंग पर नियत्रंण रखता है। पेशे से वैज्ञानिक होने के कारण रंगों के इस प्रभाव का सम्बन्ध मैंने भवन सामग्री तथा वास्तु नियमों से स्थापित किया है। अपने प्रयोगों में मैंने यह सब प्रभावशाली भी पाए हैं।

सूर्य में सात रंग है। परन्तु वास्तव में कुछेक वास्तु शास्त्री भी छः रंगों के अस्तित्व को मानते हैं – श्वेत, लाल, पीला, हरा, नीला, तथा काला। वस्तुतः सात रंग अथवा नौ रंग इन छः रंगों के मेल मिलाप का ही परिणाम हैं। सुनकर आश्चर्य होगा कि रंगों के मेल-मिलाप से दस लाख रंग बनाए जा सकते हैं। परन्तु इनमें से हम केवल 387 रंग ही देख पाते हैं। अपने दैनिक जीवन में नव रस तथा नव रंगों का अनोखा सम्बन्ध हम देखते हैं। यह हमारे मनोभाव के द्योतक हैं। विडम्बना यही है कि रंगों के इन संयोगों का अपने जीवन में हम ठीक-ठीक ताल मेल नहीं बैठा पातें। कभी अनुभव करें विभिन्न रस यदि अपने अनुरुप रंग के साथ हैं तो आप कितना सुखःद अनुभव करते हैं।
1. श्रंगार (Erotica) श्याम रंग
2. हास्य (Laugher) श्वेत
3. करुणा (Pathetic) मटमैला
4. रुद्र (Furious) लाल
5. वीर (Heroic) लाल, नीला
6. वीभत्स (Heroic) नीला
7. दैवी (Supernatural) पीला
8. प्रेम (Love) गुलाबी
9. दया (Emotion)  सफेद
रंगों में तथा रंगों से लयबद्धता (Harmony) बनाकर वास्तु जनित दोषों को दूर करना ही योग्य वास्तुविद् की पहचान है। रस के समान विभिन्न दिशा-विदिशा में भी रंगों का अधिपत्य है तदनुसार योगदान और प्रभाव है। घर में पुताई अथवा डिस्टेंम्पर दिशा अनुसार करवाने से वास्तु के अनुरुप प्रभाव मिलते हैं।

भवन के पूरब का भाग सफेद रंग का रखें।
भवन के पश्चिम का भाग नीले रंग का रखें।
भवन के उत्तर का भाग हरे रंग का रखें।
भवन के दक्षिण का भाग लाल, गुलाबी रहे।
भवन के दक्षिण-पूरब भाग को मटमैला करवाएं।
भवन के दक्षिण-पश्चिम भाग में हरा रंग रखें।
भवन के उत्तर-पूरब में पीला रंग करवाएं तथा
भवन के उत्तर-पश्चिम में सफेद रंग रखें।

जन्म पत्रिका में विभिन्न ग्रहों के सापेक्षिक बल के अनुसार, विभिन्न रंगों के गुणधर्म तथा उनकी अनुकूलता के अनुरुप तथा दिशा, भवन सामग्री का ध्यान यदि निर्माण से पूर्व रखा जाए तो सकारात्मक प्रभाव निश्चित रुप से प्राप्त होते हैं। यह एक प्रकार है। ऐसे अनेक विकल्प हैं और सम्भवतः अन्य भी हो सकते हैं जिन्हें खोजना तदनुसार जीवन में प्रयोग करना मैं पाठकों के अपने बुद्धि-विवेक पर छोड़ता हॅू।


ग्रह कमरा रंग शरीर का अंग दिशा भवन-सामग्री
सूर्य ड्राइंग रुम रक्त-पीत चेहरा उत्तर पत्थर
चन्द्र बाथ रुम श्वेत ऑख दक्षिण-पश्चिम लकड़ी
मंगल किचन तथा डाइनिंग रुम रक्त पेट दक्षिण ईट
बुध कॉमन हाल हरा मस्तिष्क उत्तर प्लास्टर
गुरु पूजा, लाइब्रेरी सुनहरा-पीत सिर उत्तर-पूरब मौर्टार
शुक्र बैड रुम श्वेत अथवा हरा दिल पूरब कंक्रीट
शनि स्टोर रुम नीला आंत पश्चिम स्टील
राहु फ्रंट डोर मटमैला मुंह दक्षिण-पश्चिम वायरिंग
केतु बैक डोर मिला-जुला मल-मूत्र पसीना निकलने के अंग उत्तर-पश्चिम प्लम्बिंग


याद करें, एक समय था जब रंग-बिरंगे कांच का प्रयोग भवन के खिड़की, रोशनदान, दरवाजों आदि में भवन सामग्री के रुप में किया जाता था। इसका उददेश्य अलंकरण तो था ही यह सब रंग सज्जा भवन को ग्रहों के रंगों के सापेक्ष घर को निरन्तर सकारात्मक ऊर्जा भी प्रदान करता था।

आन्तरिक गृह सज्जा में, परदे, फर्नीचर, खिड़की, दरवाजे के रंगों का भी महत्वपूर्ण स्थान है। वैसे तो रंगों के चुनाव में प्रमुखता व्यक्तिगत  चुनाव की ही रहती है तथापि रंगों की प्राथमिक जानकारी के बाद सुधि पाठकों को इस विषय के ज्ञान तथा लाभ प्राप्ति की कुछ सुविधा अवश्य हो जाएगी।

विभिन्न रंगों से वस्तु स्थिति तथा प्रभाव को भ्रामक भी बनाया जाता है। यथा छोटी छत को रंग के प्रभाव से बड़ा दिखाना, बड़ी दीवार को छोटा अथवा छोटी दीवार को तुलनात्मक रुप से क्रमशः अधिक दूर दिखाया जा सकता है। यह भ्रामक प्रभाव मात्र रंगों के हल्के-गाढ़े मिश्रणों के प्रयोग से उत्पन्न किया जाता है। इसी क्रम में वातावरण को मनचाहा ठण्डा अथवा गरम भी बनाया बनाया जा सकता है।  रंगों में स्वतः ही गरम तथा ठण्डे का गुण समाहित होता है। हरे, नीले, बैंगनी अथवा इनसे मिलते-जुलते रंगों से ठण्डा तथा लाल, पीले अथवा अन्य रंगों के मिश्रण से गरम-सा भ्रामक प्रभाव वास्तुविद् द्वारा उत्पन्न किया जा सकता है। जहॉ उत्तर दिशा की ओर के कमरे, दक्षिण दिशा की तुलना में ठण्डे होते हैं वहॉ रंगों के यह भ्रामक प्रभाव बहुत सफल सिद्ध होते हैं।

वास्तुशास्त्र की मान्यता है कि यदि आन्तरिक सज्जा हेतु प्रयुक्त रंगों के विभिन्न संयोग व्यक्ति विशेष से जब तारतम्य जोड़ लेते हैं तो सुख-समृद्धि सुनिश्चित है। घर में रंगों का चयन किस कमरे में कौन सा करें, इसका संक्षिप्त सार भी पाठकों के लाभार्थ लिख रहा हॅू।

भवन का प्रवेश द्वार वाला भाग सफेद, हल्का नीला अथवा हरा होना बहुत शुभ है। किसी भी दशा में यह भाग काले अथवा मटमैले रंग का नहीं होना चाहिए।
रसोई घर के लिए वैसे तो सफेद रंग सर्वश्रेष्ठ है तथापि् हल्के रंगों का चयन सर्वथा वर्जित है।

नव-विवाहित जोड़े के कमरे का रंग हल्का पीलापन लिए सफेद होने से दोनों में परस्पर प्रेम-स्नेह पनपता है। घर का वातावरण सुखद रहता है।

बच्चों के कमरे में गुलाबी अथवा क्रीम कलर सर्वश्रेष्ठ है। यहॉ के इन रंगों से बच्चों में एकाग्रता की वृद्धि होती है। यहॉ लाल तथा काला रंग प्रयोग नहीं करना चाहिए। हॉ फर्नीचर का कुछ भाग अवश्य काला रखवाया जा सकता है। यहॉ रहने वाले बच्चे शैतानी छोड़ देते हैं।

खाने के कमरे का हरा अथवा नीला रंग पाचन क्रिया में बहुत उपयोगी सिद्ध होता है।

पूजा गृह सफेद अथवा हल्का पीलापन लिए हुए रखवाना बहुत शुभ है।
भवन में विभिन्न रंगों का सर्वाधिक प्रभाव मनः स्थिति को प्रभावित करता है इसलिए कमरों में रंगाई के समय रंगों का प्रभाव का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

*  नीला रंग सात्विकता तथा शक्ति का प्रतीक है। यह व्यक्ति की सतोगुणी प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है।
* हरा रंग काम के प्रति आसक्ति दर्शाता है। यह सक्रियता तथा गतिशीलता का प्रतीक है।
*  पीला रंग विदूषक है। यह गुदगुदाने वाला गुण रखता है। यह चिंता तथा वैमनस्य से दूर रखता है।
*  जामुनी रंग अपरिपक्व मानसिकता का प्रतीक है।
* कथ्थई रंग इन्द्रिय लिप्सा तथा असंयमित जीवन का द्योतक है।
*  भूरा रंग तटस्थ बनाता है।
*  काला रंग विरोधाभास का कारक है।
*  सफेद रंग शान्ति तथा स्वच्छता का प्रतीक है।
*  लाल रंग एकाग्रता देता है। इस रंग का सांस्कृतिक महत्व है। यह सौभाग्य का सूचक है।
*  जो व्यक्ति काला रंग पसंद करते हैं वह निषेधात्मक चितंक होते हैं।

वस्तुतः यह अधिकार पूर्वक कहा जा सकता है जैसे हमारे विचार होंगे वैसा ही रंग हम पसन्द करेंगे। परन्तु यदि रंगों के अनुरुप व्यक्ति को वातावरण मिलता रहे तो विचार धारा रंगों के गुणों के अनुरुप भी की जा सकती है। इस क्षेत्र में विश्वव्यापी शोध कार्य निरंतर हो रहे हैं।

ब्रह्माण्ड के सात लोकों की तरह मनुष्य के शरीर में भी सात तत्व  कार्यरत हैं – फिजिकल, मेण्टल, एस्ट्रल, बौद्धिक, निर्वाणिक, परा-निर्वाणिक तथा महापरा निर्वाणिक। सात रंगों के प्रकम्पन सात पदाथरें – ठोस, द्रव, गैस तथा पदार्थ की चार अवस्थाऍ ‘ईश्वर’ के ही हैं। वास्तव में इन्हीं से ही ग्रह-नक्षत्रों का निर्माण हुआ और इन्हीं से ही मनुष्य की मनःस्थिति, मनोंभाव आदि का संचालन हुआ। सूर्य के सात रंगों की तरह अन्य ग्रहों के रंग का अपना-अपना प्रभाव है जिसे वास्तुविद् भवन निर्माण के समय अनुकूल बनाने का उपक्रम करता है। वास्तव में कितना सफल हो रहा है वह, यह अलग विषय है।

रत्न तथा रोग में, विभिन्न रंगों के गुण-धर्म-प्रभाव का सबसे अच्छा उपयोग वैकल्पिक चिकित्सा में किया जा रहा है। रंगों का सम्बंध भावना से है और बीमारी के बारे में कहा गया है कि यह मष्तिष्क में उत्पन्न होती है और शरीर में पलती है अर्थात् बीमारी मूलतः भावना प्रधान है। रंगों का सीधा प्रभाव हमारे पंचकोषों एवं षट्चक्रों के रंगों पर भी पड़ता है। जो हमारे समस्त शरीर-तंत्र के संचालक हैं। रंगों के प्रभावी गुण के कारण ही रंग चिकित्सा का चलन हुआ। इस चिकित्सा में शारीरिक तथा मानसिक रुग्णता दूर करने का उपक्रम-साधन रंग ही हैं। रत्न के पीछे प्रभाव का मूल कारण रंग ही है। इसीलिए विभिन्न रोगों के निदान में रत्नों का महत्वपूर्ण स्थान है। विज्ञान भी मान रहा है कि अल्ट्रावायलैट किरणें (पराबैंगनी) मन, मष्तिष्क तथा शरीर के हारमोन्स तथा एन्जाइंम्स को प्रभावित करने का गुण रखती हैं। यह जीवन शक्ति को बढ़ाने में अत्यन्त उपयोगी हैं।

वास्तु ज्योतिष में ग्रहों तथा विभिन्न रंगों के तारतम्य को जोड़ने पर बल दिया गया है क्योंकि इनमें हुआ असन्तुलन ही बीमारियों का मूल कारण है।
वैसे तो रंग विभिन्न बीमारियों पर उनका तरह-तरह से उपयोग ‘फोटो मैडिसन’ के अन्तर्गत आज सर्वविदित है। परन्तु इनमें भी सबसे अधिक चर्चित, सर्वसुलभ तथा सस्ता वास्तु शास्त्र के अन्तर्गत रंगों का चुनाव करना ही है। कुछ बीमारियों के लिए लाभदायक रंग लिख रहा हॅू। इनका प्रयोग रंगाई-पुताई के साथ-साथ अपने नित्य प्रयोग होने वाले कपड़ों आदि में भी कर सकते हैं ताकि अधिक से अधिक इन रंगों का समावेश आपके भवन तथा शरीर पर हो सके।

*  बैंगनी रंग का प्रभाव सीधा दमे और अनिद्रा के रोगी पर पड़ता है। अर्थराइट्सि, गाउट्स, ओंडिमा तथा प्रत्येक प्रकार के दर्द में यह सहायक है। जहॉ मच्छरों का अधिक प्रकोप होता है वहॉ बैंगनी रंग सहायक है। इसका सीधा प्रभाव शरीर में पोटेशियम की न्यूनता को दूर करता है।
*  शरीर में शिथिलता-नपुंसकता दूर करने के लिए सिंदूरी रंग गुणकारी है।
*  शरीर में त्वचा संम्बन्धी रोगों में नीला अथवा फिरोजी रंग अच्छा कार्य करता है।
*  जो बच्चे पढ़ाई से जी चुराते है अथवा अल्पबुद्धि के होते हैं उनके कमरे लाल अथवा गुलाबी रंग के करवाएं उनकी एकाग्रता बढ़ेगी तथा शैतानी कम होगी।
*  पीला रंग हृदय संस्थान तथा स्नायु तंत्र को नियंत्रित करता है। तनाव, उन्माद, उदासी, मानसिक दुर्बलता तथ अम्ल-पित्त जनित रोगों में भी यह सहायक है। मष्तिष्क को सक्रिय करने का इस रंग में विलक्षण गुण है। इसलिए विद्यार्थी तथा बौद्धिक वर्ग के लोगों के कमरे पीले रंग के रखवाया करें।
*  हरा रंग दृष्टिवर्धक है। उन्माद को दूर कर यह मानसिक शान्ति प्रदान करता है। घाव को भरने में यह जादू-सा असर करता है परन्तु ऊतकों और पिट्यूटरी ग्रंथि पर इस रंग का प्रभाव विपरीत भी हो सकता है।
*  पेट से सम्बन्धित बीमारी के रोगी आसमानी रंग को जीवन में उतारें।
*  नारंगी रंग तिल्ली, फेफड़ों तथा नाड़ियों पर प्रभाव डालकर उन्हें सक्रिय बनाता है। यह रंग रक्तचाप को भी नियंत्रित करता है।
*  लाल रंग भूख बढ़ाता है। सर्दी, जुकाम, रक्तचाप तथा गले के रोगों में भी यह रंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
*  पक्षाघात वाले रोगियों को सफेद पुते कमरे में रखने तथा अधिकाधिक सफेद परिधान प्रयोग करवाने से चमत्कारिक रुप से लाभ मिलता है।

आज विश्वव्यापी स्तर पर स्वीकार कर लिया गया है कि रंगों में ‘ईथर’ की प्राणतत्व की ऐसी अनेकानेक सूक्ष्म शक्तियां सन्निहित हैं जिनका उपयोग कर हम स्वास्थ्य लाभ तो कर ही सकते हैं, अनन्त अन्य शक्तियों के स्वामी भी बन सकते है। आवश्यकता केवल रंग-वर्ण भेद को समझने की है, उनके समायोजन की विधि-व्यवस्था जानने की है और उन्हें अपने जीवन में उतारने की है।

@

मानसश्री गोपाल राजू (वैज्ञानिक), राजपत्रित अधिकारी अ.प्रा. के सारगर्भित, मौलिक अन्य लेखों के लिए कृपया उनकी वेबसाइट astrotantra4u.com; gopalrajuartilces.webs.com; gopalrajuarticles.yolasite.com

में जाएँ | (अधिकांशतः लेख उनकी चर्चित पुस्तकों के ही सार-संक्षेप   हैं)

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    June 4, 2011

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